2020 कई मायनों में बुरा और बहुत बुरा था, कहा जा सकता है यह हमारी ज़िंदगी का सबसे उदास बरस रहा

एक अंग्रेज़ी फ़िल्म है। इसमें महारानी मन ही मन एक नवयुवक से प्यार करती हैं। महारानी ने एक दिन उस नवयुवक को एक महत्वपूर्ण काम सौंपकर समुद्री जहाज़ पर भेजा। जाते हुए जहाज़ को दूर दूरबीन से देखते हुए महारानी परेशान हो जाती हैं।

देखती हैं कि उस नौजवान की प्रेमिका भी जहाज़ पर उसके साथ है। वे दोनों डैक पर खड़े हैं। उस समय महारानी को परेशान देखकर उनका एक शुभचिंतक कहता है - ‘मैडम, लुक ए बिट हायर’! ऊपर, उस नवयुवक और उसकी प्रेमिका के सिर पर आपके राज्य का झंडा लहरा रहा है...।

कुल मिलाकर यह जो 2020 जा रहा है, कई मायनों में बुरा और बहुत बुरा था। कहा जा सकता है यह हमारी ज़िंदगी का सबसे उदास बरस रहा। ज़िंदगी के कैलेंडर के फटे हुए पन्ने की तरह। मन ने घर की दहलीज़ों के बाहर कदम रखना चाहा, लेकिन सामने कोई रास्ता नहीं था। पांव कांपते रहे, दिल धड़कता रहा। सालभर लगता रहा उदासी कहीं हमारा शाही लिबास न बन जाए और हम इसे ही हर समय पहने रहें!

जिस दहलीज़ के भीतर पांव रखें, वह वैराग्य का स्थान न बन जाए! ऐसा न हो कि हमारे दोस्तों के पांव उम्रभर हमारी उदासी के साथ चलते रहें। लेकिन ऐसी कठिन परिस्थिति और मनोदशा में भी हम संभले। लुक ए बिट हायर! हमने सोचा, कई मायनों में परखा और जाना भी कि अगर निराशा हावी हो गई तो चांद-सूरज की सुंदरता, सवेरे की पहली किरणों का संगीत, गहरी रातों की खामोशी, पत्तों से छनती हुई मेंह की बूंदें, घास पर फिसलती हुई ओस, यह सब हमारे लिए कड़वा हो जाएगा। दरअसल, अपने अनुभवों से इनकारी होना वैसा ही है जैसे अपनी ज़िंदगी के होंठों में कोई हमेशा के लिए झूठ भर ले... ऐसा करना अपनी रूह से इनकारी होना है...!

बहरहाल, हमारे जीवन में अब तक कई साल आए और चले गए। कोई जीवन को गुलाब की तरह महका गया, कोई कड़वा अनुभव दे गया। 2020 वो बरस था जो रक्तरंजित था। जान की बाजियां लगाई गईं और खून का खेल खेला गया। वैसे ही जब स्पार्टिकस जैसे हजारों गुलाम रोमन शासकों के मनोरंजन के लिए एक-दूसरे की जान से खेलते थे। आज हालात ये हैं कि जैसे तैसे 2020 बीतने जा रहा है और समझा जा रहा है कि एक जो त्रास था, संत्रास था, वह भी बीतने जा रहा है।

हर कोई अब वैक्सीन की राह तक रहा है और उसी के इंतज़ार में अपने तमाम अंगों को गुच्छा किए हुए बैठा है, जैसे भर ठंड में लोग रजाई ओढ़े दुबके रहते हैं। आख़िरी के कुछ दिन बचे हैं, जो बीते जा रहे हैं। इस रहने और बीतने के बीच के पर्दे में जो खिड़कियां हैं, उनसे झांको तो हवा इस तरह सांय-सांय करती है- जैसे इतिहास के पहलू में बैठकर रो रही हो! बाहर ऊंचे-ऊंचे पेड़ दुखों की तरह उगे हुए हैं। कई जगह पेड़ नहीं होते, वीरानी होती है और इस वीरानी के टीले ऐसे प्रतीत होते हैं, जैसे टीले नहीं, क़ब्रें हों।



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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर


Source From
RACHNA SAROVAR
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