महाभारत में युद्ध की शुरुआत में ही अर्जुन ने श्रीकृष्ण के सामने अस्त्र-शस्त्र रख दिए थे और युद्ध करने से मना कर दिया था। उस समय श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था। गीतासार में बताई गई बातों का ध्यान रखेंगे तो आज भी हमारी कई परेशानियां खत्म हो सकती हैं।
श्रीमद् भगवद् गीता के आठवें अध्याय के सातवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कर्म का महत्व बताया है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि-
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।
श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में अर्जुन से कहा कि तुम मेरा चिंतन करो, लेकिन अपना कर्म भी करते रहो। शास्त्र अपना काम बीच में छोड़कर केवल भगवान का नाम लेते रहने का नहीं कहते। भगवान कभी भी अव्यावहारिक काम करने से प्रसन्न नहीं होते हैं। श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म किए बिना जीवन सुखमय और सफल नहीं हो सकता है। सिर्फ अपने कर्म से हमें वो सिद्धि मिल सकती है, जो संन्यास लेने से भी नहीं मिल सकती है। इसीलिए कर्म पर ध्यान लगाना चाहिए।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने कर्म को ही महत्वपूर्ण माना है। जो लोग सिर्फ भक्ति करते हैं और कर्म नहीं करते, उन्हें जीवन में सुख और सफलता नहीं मिल सकती है। शास्त्र भी यही कहते हैं कि व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। जब तक कर्म नहीं करेंगे तब तक ये जीवन पूर्ण नहीं हो सकता है।
महाभारत युद्ध के प्रसंग का संक्षिप्त सार
श्रीकृष्ण की सभी कोशिशों के बाद भी कौरव और पांडवों के बीच होने वाला युद्ध नहीं टल सका और दोनों पक्षों की सेनाएं आमने-सामने आ गई थीं। कौरवों की सेना में दुर्योधन, शकुनि के साथ भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य अश्वथामा जैसे महारथी थे। अर्जुन कौरव पक्ष में अपने वंश के आदरणीय लोगों को देखकर दुखी हो गए थे। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि मैं भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य पर बाण नहीं चला सकता। ऐसा कहते हुए अर्जुन ने शस्त्र रख दिए थे। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाने के लिए गीता का ज्ञान दिया था।
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Source From
RACHNA SAROVAR
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