चीन को ऐसा न लगे कि हम उसे अपना दुश्मन मान रहे हैं इसलिए हमें चीन से आरआईसी, ब्रिक्स और जी20 जैसे विभिन्न फोरम में संबंध बनाए रखने चाहिए

चीनियों और भारतीय सैनिकों के बीच गलवान घाटी में हुए क्रूर संघर्ष को देखते हुए कुछ ऐसी रणनीतियों पर विचार होने लगा है, जिनके बारे में पहले सोचना भी मुमकिन नहीं था। क्या भारत को गठबंधन को लेकर अपने आदतन संकोच को छोड़ उन देशों के साथ जुड़ जाना चाहिए जो अमेरिका के नेतृत्व में ‘चीन को रोकने’ के पक्ष में खुलकर बोल रहे हैं?

अब तक इसका स्वाभाविक जवाब ‘न’ रहा है। शीत युद्ध के दौरान गुट-निरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक रहे भारत को गठबंधन से ऐतराज रहा है और उसकी सभी रणनीतिक अंडों को एक ही टोकरी में रखने की कोई इच्छा नहीं है। भारत सैन्य हथियारों के लिए रूस पर बहुत ज्यादा निर्भर है, हालांकि वह अमेरिकी, फ्रांसीसी और इजरायली हथियारों को शामिल करने के लिए अपनी खरीदाें में विविधता लाया है। और डोनाल्ड ट्रम्प का अमेरिका भारत को कभी भी बहुत खास विश्वसनीय साझेदार नहीं लगा है।

साथ ही चीन के साथ व्यापार 92.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया था और अगर बीच में कोविड-19 न आया होता, तो इस साल इसके 100 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद थी। मोदी बतौर प्रधानमंत्री पांच बार चीन जा चुके हैं और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से इतनी बार मिल चुके हैं, जितना कोई भी वैश्विक नेता नहीं मिला। आठ महीने पहले ही उन्होंने ‘दो देशों के बीच सहयोग के नए दौर’ का ढिंढोरा पीटा था।

इस सहयोग को विवादित 3500 किमी लंबी सीमा, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हुई गतिविधियों से तेज झटका लगा है। कुछ लोग जोर-शोर से यह तर्क दे रहे हैं कि भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की अवधारणा को अपनाना चाहिए और ऑस्ट्रेलिया तथा जापान के साथ अपने कूटनीतिक संबंधों को मजबूत कर अमेरिका के नेतृत्व वाले ‘क्वाड’ (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समूह) को बेहतर बनाना चाहिए। यह तर्क दिया जा रहा है कि चीन को रोकना जरूरी है और हम यह अकेले नहीं कर सकते। युद्ध कोई नहीं चाहता। सब चाहते हैं कि उसकी रोकथाम ही सही तरीका है।

मुझे ऐसा नहीं लगता। मैं शी के ज्यादा हठी और सैन्यबल इस्तेमाल करने वाले चीन का फैन नहीं हूं, जो ऐसा लगता है कि अपने ‘शांतिपूर्ण उदय’ की बातों से मुकर गया है और अपने पड़ोसियों को युद्ध के माहौल से डराना चाहता है, जिनमें जापान, वियतनाम, ताइवान, फिलिपिन्स, हांगकांग और अब भारत भी शामिल है। लेकिन मुझे चीन की हठधर्मिता को रोकने की बजाय, उसे नियंत्रित करते हुए उसके साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर जुड़े रहना ज्यादा बेहतर लग रहा है।

रोकने (कंटेनमेंट) और नियंत्रित (कंस्ट्रेन) करने में अंतर है। रोकथाम एक ऐसी रणनीति है, जिसमें कोई संबंध, कार्य या बातचीत नहीं होती। यह शत्रुतापूर्ण नीति है। दूसरी तरफ नियंत्रित करने का मतलब है कुछ सीमाओं या प्रतिबंधों के साथ संबंध बनाए रखना, जो उसके व्यवहार के पहलुओं को अस्थिर करे। ऑस्ट्रेलिया के पूर्ण विदेश सचिव पीटर वर्गीस इसे अच्छे से समझाते हैं: ‘कंटेनमेंट के लिए चीन को सफल होने से रोकने और कमजोर करने की जरूरत होगी। वहीं कंस्ट्रेन के लिए शक्तिशाली चीन को प्रबंधित करने की जरूरत होगी।’

चीन को नियंत्रित करने में क्वाड को सैन्य गठजोड़ में बदलना शामिल नहीं होगा। खुद को गठबंधनों में न उलझाकर, अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखकर भारत ने अब तक सही किया है। बल्कि यह बीजिंग की महत्वाकांक्षाओं को सीमित करने, चीन के पड़ोसियों के लिए उनकी कूटनीतिक, भू राजनैतिक और सैन्य लाभ के इस्तेमाल का जरिया रहा है।

क्वाड देशों (अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया) के साथ सामंजस्य उस लाभ को बढ़ाने का एक तरीका है। मैँ और आगे की सोचते हुए इस समूह में इंडोनेशिया, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया को भी शामिल करना चाहूंगा, जिनकी चीन की नई हठधर्मिता को लेकर समान चिंताएं हैं। वर्गीस के शब्दों में, ‘हम सब मिलकर चीन के प्रतिरोधी व्यवहार को रोक सकते हैं और उसे ऐसे व्यवहार की कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकते हैं।’

नई दिल्ली को नियंत्रित करने की इस रणनीति पर काम करते हुए बीजिंग के साथ सभी संवाद जारी रखने चाहिए। हमें अपना व्यापार बढ़ाना जारी रखना चाहिए (हमारी सप्लाई चेन में विविधता लाते हुए ताकि हम ऐसे प्रवाह पर जरूरत से ज्यादा निर्भर न हो जाएं कि उसे बंद न किया जा सके)। हमें क्षेत्रीय और यूएन जैसे बहुपक्षीय संगठनों में भी सहयोग देना जारी रखना चाहिए। हमें चीन से आरआईसी, ब्रिक्स और जी20 जैसे विभिन्‍न फोरम में संबंध बनाए रखने चाहिए।

चीन द्वारा पाकिस्तान को समर्थन देने के बावजूद उसे ऐसा नहीं लगना चाहिए कि हम उसके साथ दुश्मन जैसा बर्ताव कर रहे हैं। लेकिन हमें रणनीतिक आधारों से हटने को भी पहचानना चाहिए। यह हमारे हित में है कि हम चीन को ‘रोकें’ नहीं, बल्कि उसे ‘नियंत्रित’ करें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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China should not feel that we are treating it as our enemy


Source From
RACHNA SAROVAR
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