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आखिर 2020 विदा हो ही गया। पूरी दुनिया 2021 को उम्मीदों भरी निगाहों से ताक रही है। सबसे बड़ी आस कोरोना वैक्सीन से है। और हो भी क्यों न। आखिर पूरा 2020 कोरोना को झेलते ही तो बीता है।

(2021 इस सदी के लिए उम्मीदों का सबसे बड़ा साल है। वजह- जिस कोरोना ने देश के एक करोड़ से ज्यादा लोगों को अपनी चपेट में लिया, उसी से बचाने वाली वैक्सीन से नए साल की शुरुआत होगी। इसलिए 2021 के माथे पर यह उम्मीदों का टीका है।)

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दुनियाभर के लोग पूरे साल जानलेवा कोरोनावायरस की लाल तस्वीर देखते रहे। वैज्ञानिकों ने इसे Severe Acute Respiratory Syndrome Coronavirus-2 यानी SARS-CoV-2 नाम दिया है। तो आइये नए साल के पहले दिन देखते हैं उस अनोखे पार्टिकल की तस्वीर जो हू-ब-हू कोरोनावायरस की तरह दिखता है। इसके चारों ओर भी कोरोनावायरस की तरह स्पाइक्स हैं। लेकिन, यह एकदम उलटा काम करता है। यह कोरोना फैलाता नहीं, बल्कि उसके वायरस को मारता चलता है।

यह तस्वीर है- कोरोना के VLP (Virus like particle) यानी कोरोनावायरस जैसे पार्टिकल की। इसे प्रकृति ने नहीं बल्कि कोरोना की काट तलाश रहे वैज्ञानिकों ने बनाया है।

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वायरस लाइक पार्टिकल (VLP) की तस्वीर वैज्ञानिकों ने कंप्यूटराइज्ड 3डी तकनीक से तैयार की है। कोरोना वायरस से अलग दिखाने के लिए इसका रंग हरा रखा गया है।

कहते हैं न कि दुश्मन को मारने के लिए उसके जैसे वेष में ही उसकी सेना में घुस जाओ। ठीक उसी अंदाज में VLP को भी हू-ब-हू कोरोनावायरस की तरह प्रोटीन से बनाया गया है। इन पार्टिकल्स से दुनिया भर में कोरोना की कई वैक्सीन तैयार की जा रही हैं। इनमें कई वैक्सीन्स के क्लिनिकल ट्रायल चल रहे हैं।

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माइक्रोस्कोप से ऐसा दिखता है VLP, एकदम कोरोनावायरस की तरह

कनाडा की फार्मा कंपनी मेडिकागो की ओर से जारी VLP की तस्वीर।
पहली तस्वीर कोरोना वायरस की है और दूसरी उसकी तरह दिखने वाले VLP की।

VLP को शरीर कोरोना वायरस समझेगा और उन्हें मारने की ताकत जुटा लेगा

आइडिया यह है कि वैक्सीन के जरिए जैसे ही VLP इंसानी शरीर में पहुंचेंगे तो वह धोखा खा जाएगा। हमारे शरीर को लगेगा कि कोरोनावायरस आ गया है और वह इसे मारने के लिए अपनी प्रतिरोधक तंत्र को सक्रिय कर देगा।

हमारे शरीर में कोरोना के खिलाफ एंटी-बॉडीज बनना शुरू हो जाएंगे। वह भी इतनी तादाद में कि कई महीनों या साल तक अगर हमारे शरीर का सामना असली कोरोनावायरस से होता है तो पहले से तैयार एंटी-बॉडीज उसे मार देंगे।

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इस वैक्सीन से कोरोना होने का कोई डर नहीं

दूसरी तकनीकों से बनने वाली कई वैक्सीन्स की तरह इन पार्टिकल से बनने वाली वैक्सीन से कोरोना होने का बिल्कुल भी डर नहीं। दरअसल, इनमें किसी भी वायरस की जान, यानी जेनेटिक मेटेरियल ही नहीं है। यह पार्टिकल्स कोरोनावायरस की तरह होने के बावजूद अपनी संख्या बढ़ा नहीं सकते।

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कनाडा की कंपनी पौधों से बनाई सस्ती वैक्सीन, भारत में भी कवायद

दुनिया की कई कंपनियां इस नई टेक्नोलॉजी से वैक्सीन बनाने में जुटी हैं। अब तक स्तनधारियों से लिए गए प्रोटीन के जरिए यह पार्टिकल बनाए जा रहे थे, लेकिन कनाडा की बायोटेक्नोलॉजी कंपनी Medicago ने मात्र 20 दिनों में पौधों के प्रोटीन से कोरोना के VLP बना लिए हैं।

कंपनी का दावा है इस टेक्नोलॉजी से तैयार वैक्सीन बेहद सस्ती, कम समय और कम जगह में तैयार होगी। कंपनी ने इस आधार पर कोरोना वैक्सीन विकसित कर ट्रायल जुलाई में ट्रायल शुरू किए। इस तकनीक से वैक्सीन तैयार करने में एंटीजन की बेहद कम मात्रा में जरूरत होती है। ऐसे में कम खर्च में वैक्सीन से ज्यादा डोज तैयार की जा सकती हैं।

भारत में हैदराबाद की जीनोम वैली में स्थित फार्मा कंपनी बायोलाजिकल E ने VLP आधारित कोरोना वैक्सीन तैयार की है। जिसके phase-1 और phase-2 के क्लीनिकल ट्रायल चल रहे हैं।

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पौधों को बायो-रिएक्टर बनाकर तैयार होता है वैक्सीन का कच्चा माल

परंपरागत रूप से वैक्सीन के लिए एंटीजन बनाने के लिए जीवित वायरस को मारकर विभाजित किया जाता है। इसके लिए भारी संख्या में वायरस की जरूरत होती है। इसके काम में आमतौर पर मुर्गी के चूजों के भ्रूण या निषेचित अंडों को बायो-रिएक्टर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। मतलब अनुकूल वातावरण बनाकर इनमें ही भारी संख्या में वायरस पैदा किए जाते हैं।

जबकि, VLP वाली वैक्सीन में वायरस जैसे पार्टिकल्स को भारी संख्या में बनाने के लिए पौधों को बायो-रिएक्टर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह वैक्सीन बनाने का कच्चा माल यानी एंटीजन न केवल कम समय में बल्कि बेहद कम लागत से तैयार हो जाता है। इससे वैक्सीन भी सस्ती और तेजी से तैयार की जा सकती है।

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RACHNA SAROVAR

नए साल पर टाटा ग्रुप के चेयरमैन एमेरिटस रतन टाटा ने भास्कर के पाठकों के लिए विशेष संदेश दिया है। दैनिक भास्कर के रितेश शुक्ल से एक घंटे से भी ज्यादा लंबी बातचीत में उन्होंने 2021 की उम्मीदों, हमारी ताकत और चिंताओं पर अपने विचार रखे। इस बातचीत का सार एक आर्टिकल के रूप पेश है...

नए वर्ष में दूसरों के विचारों के प्रति समझ और सहिष्णुता हमारी ताकत

कोविड काल की शुरुआत में ऐसा लगा कि ईश्वर ने आराम का अवसर दिया है लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया स्थितियां बदलती गईं। हमें अपने काम से मिलने वाली संतुष्टि का स्तर हर दिन घटता गया क्योंकि हफ्ते के सारे दिन और सारे हफ्ते एक जैसे दिखने लगे। रविवार और सोमवार का फर्क कर पाना मुश्किल हो गया। हर रात को नींद आने से पहले बीते दिन के बारे में सोचो तो यही लगता कि हम जितना कर सकते थे, उतना नहीं कर पाए।

यह स्थिति कब बदलेगी

सच पूछिए तो इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं है। अगर कोई कहता है कि वह उत्तर जानता है तो वह संभवत: सच नहीं बोल रहा है। साल बदल रहा है और अगर आप मुझसे पूछें तो मैं नए साल में खुद के लिए दूसरों के विचार समझने की बेहतर बुद्धि ईश्वर से मांगूंगा। दूसरों के दृष्टिकोण समझना और उनके प्रति सहिष्णुता ही हमारी ताकत है।

महामारी ऐसी ताकत है जिसका सम्मान करते हुए सामना करना होगा

मुझे लगता है कि दुनिया में अलग-अलग चक्र चलते रहते हैं। बिजनेस का चक्र, स्वास्थ्य का चक्र...महामारी का चक्र। समय-समय पर कोई चक्र ऊपर उठता है तो लगता है कि वह दूसरे सभी चक्रों पर हावी हो गया है, मगर यह हमेशा नहीं रहता। एक समय था जब लग रहा था कि एचआईवी मानव जाति को लील जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुझे लगता है कि कोविड के प्रश्न का भी हम ऐसा कोई उत्तर ढूंढ पाएंगे जो कम से कम इस वायरस की मारक क्षमता को बहुत हद तक कम कर देगा। संभव है आप विपरीत तर्क दें और आप सही भी हो सकते हैं। आखिर यूके और यूरोप में लोगों ने कोविड के असर को नकार दिया था लेकिन आज वहां लॉकडाउन दोबारा लागू है। मैं न तो बहुत आशावादी या निराशावादी प्रतीत होना चाहूंगा। मै सतर्क रहना चाहूंगा ताकि साफ-सफाई रहे, मास्क का उपयोग होता रहे। हमें विनम्र होने की आवश्यकता है ताकि हम एहसास कर सकें कि यह वायरस बहुत ताकतवर है। इसका मतलब यह नहीं है कि हम अंधविश्वासी हो जाएं। मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि हमें इस परिस्थिति का आदर करते हुए सामना करने की जरूरत है।

प्रेरित युवा ही राष्ट्र की शक्ति

हमें कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाने कि जरूरत है। आखिर क्यों आज दुनिया कि टॉप कंपनियों का नेतृत्व भारतवंशी कर रहे हैं। दूसरा सवाल यह कि इन चुनिंदा लोगों के बाद हमें भारतवंशियों की संख्या ज्यादा क्यों नहीं दिखती? जबकि टॉप तक पहुंचे कई लोगों ने उसी संस्थान में निचले स्तर से काम शुरू किया था। वजह शायद यह है कि शीर्ष पर अवसर कम हैं। वहीं क्या वजह है कि इतनी बड़ी तादाद में भारत के लोग रोजगार पाने में भी असमर्थ हो रहे हैं? इतिहास गवाह है कि जो लोग नए समय में उत्पन्न हुई आवश्यकताओं को पूरा करने कि कोशिश करते हैं वे आगे बढ़ जाते हैं। ऐसे में हमें इस बात पर गौर करने कि आवश्यकता है कि क्या हमारे पास ऐसी व्यवस्था और वातावरण है जो रचनात्मकता को बढ़ावा दे सके? क्या युवाओं के लिए ऐसा माहौल है जिसमें अगर वो नवाचार के बारे में सोच सकते हों तो उन्हें क्रियान्वयन का भी साहस और सहयोग प्राप्त हो सके? आखिरकार जब यह महसूस होने लगा कि प्रदूषण समस्या है तब बैटरी से चलने वाले वाहनों की कल्पना हुई और आज साकार हो पा रही है। सफलता-असफलता से आगे जा कर जब तक रचना शैली, प्रयत्नशीलता और जुझारूपन को तवज्जो नहीं मिलेगी तब तक युवा नवाचार की राह पर कैसे चल पाएगा? मुझे लगता है कि प्रेरित युवा ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है। प्रेरणा और प्रयत्न को संरक्षित करना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए बाकी सब ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए।

कौशल से दूर होगी बेरोजगारी

आम तौर पर यह माना जाता है कि जॉब मार्केट में अनस्किल्ड, सेमीस्किल्ड और हाईली स्किल्ड लोग हैं। लेकिन ऑटोमेशन की वजह से एक ऐसा क्षेत्र उभरा है जिसके लिए उपयोगी कौशल, किसी डिग्री या डिप्लोमा पर निर्भरता नहीं है। मेरा मानना है कि वो जिन्हें हम प्रवासी मजदूर कहते हैं उनके पास भी विशिष्ट किस्म का कौशल है, लेकिन वे ऐसे दूषित वातावरण में हैं कि उनका श्रम सुरक्षित नहीं है। दूसरे विश्वयुद्ध में अमेरिका जब शामिल हुआ तब सैन्य उपकरण उद्योग को वहां की गृहिणियों ने संभाला। 1970 के दशक में जब तकनीक का चरम इलेक्ट्रॉनिक सर्किट हुआ करता था, तब चीन की महिलाओं ने माइक्रोस्कोप में देखते हुए तेजी से सर्किट जोड़े और तब तक जोड़ती रहीं जबतक वही काम रोबोट ने 10 गुना तेजी से करना शुरू नहीं कर दिया। पूछने योग्य प्रश्न यह है कि असल में बेरोजगारी है कहां? जहां कौशल को अवसर नहीं मिलता वहीं बेरोजगारी होती है। हमें ऐसा नेतृत्व चाहिए जो यह संकल्प लेकर मैदान में उतरे कि काम की आवश्यकता अनुसार लोगों के कुछ हिस्सों को प्रशिक्षित किया जा सके। आज सरकार कौशल विकास की दिशा में बेहद गंभीर है लेकिन बड़ा प्रश्न यह भी है कि कौशल प्राप्त करने बाद लोग देश में रहेंगे या मध्य एशिया या धरती के अन्य हिस्सों में जा बसेंगे? आखिर नर्सिंग और मेडिकल लैबोरेटरी टेक्नीशियन के क्षेत्र में यही तो हो रहा है। हमें असफलताओं में भी निवेश करने की हिम्मत रखनी होगी।

अगर कुछ चुनिंदा लोग ही हों जिनसे हम महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर मांगें तो हम बहुत कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे। एक समय था जब टाटा या बिड़ला या अन्य ऐसे बड़े औद्योगिक घराने थे जिनकी कार्यप्रणाली का अनुसरण करना बेहद मुश्किल था। आज ऐसे लोगों के उदाहरण बहुतायत में उपलब्ध हैं जिनके पास एक आइडिया था जिसे जमीन पर उतारकर उन्होंने संपन्नता हासिल की। उदाहरण के तौर पर मैं एक स्टार्टअप के साथ काम कर रहा हूं। मुझे बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। लेकिन क्या मैं अपने अर्जित ज्ञान को कैटेलॉग कर पा रहा हूं? नहीं, मैं नहीं कर पा रहा हूं। जब हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तो अपनी असफलताओं से सीखने का अवसर खो देते हैं। अपनी असफलताओं को हमें सफलता के मार्ग में मील के पत्थरों के रूप में देखना होगा। भारत में एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहां किसी नवाचार को यह जानते हुए भी लागू किया जा सके कि यह असफल हो सकता है। इन्हीं असफलताओं से मिला ज्ञान हमें सफलता तक पहुंचाएगा।

टेक्नोलॉजी को क्लाइमेट चेंज पर भी सोचना होगा

मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि आज हम क्लाइमेट चेंज को गंभीरता से ले रहे हैं। कुछ दशकों पहले लोगों के लिए यह सोचना भी अजीब था कि समय और पैसे खर्च किए जाएं ताकि हमें साफ-सुथरा नीला आकाश देखने को मिल सके। सांस लेने के लिए प्रदूषण रहित वायु उपलब्ध हो। हम अपनी अगली पीढ़ी को क्या देने जा रहे हैं, इस बात को नजरअंदाज कर रहे थे। आज भी कुछ लोग कह सकते हैं कि हमें जलवायु पर ध्यान देने से ज्यादा भोजन की उपलब्धता पर समय और पैसा खर्च करने की जरूरत है। लेकिन अब देर करना घातक साबित हो सकता है। कुछ जगहों पर तो पहले से ही देर हो चुकी है। मुझे लगता है कि जब भी हमें अपनी जेब में हाथ डालना पड़ता है उस खर्च के लिए जिसका तात्कालिक लाभ न हो तो उस खर्च का विरोध स्वाभाविक है। लेकिन आज हम ग्लेशियर के पिघलने, मछलियों के लुप्त हो जाने और प्रदूषित हो रहे जल, भोजन और वायु को नजरअंदाज नहीं कर सकते। हमेशा कुछ लोग ऐसे होंगे जो कहेंगे कि हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन हम मानें या ना मानें फर्क तो पड़ेगा ही। टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अगर इस समस्या को सुलझाने में नहीं किया गया तो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने वाले ही नहीं बचेंगे।



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न्यूयॉर्क का रिचमंड हिल इलाका मुख्य शहर मैनहट्टन से 15 मील दूर है। लेफर्ट्‌स बोलिवर्ड इस इलाके का अंतिम रेलवे स्टेशन हैं। यहां की सड़कों पर चलिए तो अंग्रेजी कम और पंजाबी ज्यादा सुनाई देती है। गाड़ियों की आवाज से तेज पंजाबी रैप सॉन्ग सुनाई देते हैं। ऐसा महसूस होता है कि आप लुधियाना की सड़कों पर घूम रहे हैं? लेकिन हकीकत में यह न्यूयॉर्क के पांच नगरों में से एक क्वींस नगर का इलाका है। इसे छोटा पंजाब के नाम से जाना जाता है।

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रिचमंड हिल के इस इलाके में पूरी तरह पंजाबी संस्कृति, बोली और रहन-सहन हावी है। पंजाबी लोगों से भरे इस इलाके में लोग असली पंजाबी पराठे का आनन्द लेने आते हैं। सड़कों पर ऐसे लोग मिल जाएंगे, जिनसे अंग्रेजी की बजाय पंजाबी या हिंदी में बात करना ज्यादा आसान है। हेयर सैलून में शाहरुख और सलमान खान स्टाइल में बाल कटवाने के लिए 10 डॉलर लगते हैं।

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यह इलाका पूरे न्यूयॉर्क में इसलिए भी प्रसिद्ध हो गया है, क्योंकि मेयर ने यहां की दो सड़कों का नाम बदल कर पंजाबी कम्युनिटी को समर्पित किया है। न्यूयॉर्क सिटी काउंसिल ने 111 स्ट्रीट और 123 स्ट्रीट के बीच स्थित 101 एवेन्यू का नाम पंजाबी एवेन्यू कर दिया है। साथ ही, 97 एवेन्यू का नाम बदलकर गुरुद्वारा स्ट्रीट कर दिया है। यह वही इलाका है जहां एक बड़ा गुरुद्वारा है।

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नाम बदलने के लिए अभियान चलाने वाली स्थानीय काउंसिल वूमेन एड्रिएन एडम्स कहती हैं कि यह निर्णय पंजाबी समुदाय द्वारा शहर के विकास में उनके योगदान को दर्शाता है। ढाबा चलाने वाले 28 साल के तेजिंदर सिंह बताते हैं कि वे 90 के दशक में रिचमंड हिल्स आए थे। यहां 70 के दशक में पंजाबी समुदाय का आना शुरू हो गया था।

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सबसे मेहनती लोगों में हैं दक्षिण एशियाई: एडम्स
स्थानीय काउंसिल वूमेन एड्रिएन एडम्स कहती हैं कि दक्षिण एशियाई लोग देश में सबसे मेहनती लोगों में से एक हैं। लेकिन, उनकी कम्युनिटी ज्यादातर अदृश्य जैसी रहती है। सड़कों का नाम भी इसलिए बदला, ताकि शहर के विकास में उनका योगदान दर्ज हो। क्वींस वही इलाका है जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पैदा और बड़े हुए।

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पुराणों के अनुसार, प्रत्येक माह में सूर्य के एक विशिष्ट रूप की पूजा की जाती है, जिससे हर मनोकामना पूरी होती है। हमारे धर्म ग्रंथों में सूर्य को प्रधान देवता माना गया है। ग्रंथों के अनुसार, पौष मास में भग नामक सूर्य की उपासना करनी चाहिए। इस बार पौष महीने की शुरुआत 31 दिसंबर, गुरुवार से हो रही है। जो 28 जनवरी, गुरुवार तक रहेगा।

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ये हिंदू पंचांग का दसवां महीना है। इस महीने से जुड़ी कई परंपराएं और मान्यताएं धर्म ग्रंथों में बताई गई हैं। ऐसी ही एक परंपरा है भगवान सूर्य की पूजा करना। वैसे तो सूर्यदेव की उपासना रोज करनी चाहिए, लेकिन इस महीने में सूर्य को अर्घ्य देने का खास महत्व बताया गया है। मान्यता है कि पौष महीने में सूर्य पूजा से सेहत अच्छी रहती है और उम्र भी बढ़ती है।

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वेद और उपनिषद में सूर्य
अथर्ववेद और सूर्योपनिषद के अनुसार सूर्य परब्रह्म है। ग्रंथों में बताया गया है कि पौष मास में भगवान भास्कर ग्यारह हजार किरणों के साथ तपकर सर्दी से राहत देते हैं। इनका वर्ण रक्त के समान है। शास्त्रों में ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य को ही भग कहा गया है और इनसे युक्त को ही भगवान माना गया है। यही कारण है कि पौष मास का भग नामक सूर्य साक्षात परब्रह्म का ही स्वरूप माना गया है। पौष मास में सूर्य को अर्घ्य देने तथा उसके निमित्त व्रत करने का भी विशेष महत्व धर्म शास्त्रों में लिखा है।

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ग्रंथों के अनुसार क्या करें
आदित्य पुराण के अनुसार, पौष माह के हर रविवार को तांबे के बर्तन में शुद्ध जल, लाल चंदन और लाल रंग के फूल डालकर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए तथा विष्णवे नम: मंत्र का जाप करना चाहिए।
इसके साथ ही दिनभर व्रत रखना चाहिए और खाने में नमक का उपयोग नहीं करना चाहिए। संभव हो तो सिर्फ फलाहार ही करें।

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रविवार को व्रत रखकर सूर्य को तिल-चावल की खिचड़ी का भोग लगाने से मनुष्य तेजस्वी बनता है। पुराणों के अनुसार पौष माह में किए गए तीर्थ स्नान और दान से उम्र लंबी होती है और बीमारियां दूर हो जाती हैं।

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